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देश- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े जनजाति सुरक्षा मं : सांस्कृतिक समागम के नाम पर संस्कृति से खिलवाड़!

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सांस्कृतिक समागम के नाम पर संस्कृति से खिलवाड़!

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(आलेख : बृंदा करात)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े जनजाति सुरक्षा मंच और वनवासी कल्याण आश्रम ने हाल ही में दिल्ली में “जनजातीय सांस्कृतिक समागम” आयोजित किया, जिसमें देशभर से हजारों आदिवासियों को जुटाया गया। आयोजन को बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती से जोड़ा गया। समापन पर आयोजकों ने रेलवे मंत्रालय से लेकर केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों तक सरकारी तंत्र के सहयोग के लिए आभार जताया। गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि थे। इस तरह यह केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि अर्ध-सरकारी राजनीतिक मंच था। इसलिए वहां उठाए गए सवालों और गृह मंत्री की प्रतिक्रिया को गंभीरता से समझना जरूरी है।

जनजाति सुरक्षा मंच का मुख्य एजेंडा ईसाई आदिवासियों के खिलाफ है। उसकी प्रमुख मांग है कि ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर किया जाए और उनसे संवैधानिक अधिकार छीने जाएं। यह दावा किया जाता है कि धर्म परिवर्तन के बाद वे आदिवासी पहचान खो देते हैं। इसी सोच के आधार पर मध्य भारत के कई राज्यों, खासकर छत्तीसगढ़ में, ईसाई आदिवासी परिवारों के खिलाफ हिंसक अभियान चलाए गए हैं। कई जगह उनके निजी कब्रिस्तानों से शव तक जबरन निकाले गए हैं। इस वर्ष फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों पर अंतरिम रोक लगाई थी, लेकिन भाजपा शासित राज्यों में ऐसी घटनाएं जारी हैं।

दिल्ली के सम्मेलन में यह मांग सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के संदर्भ में उठाई गई, जिसमें 1950 के राष्ट्रपति आदेश को बरकरार रखते हुए कहा गया कि हिंदू धर्म के अलावा अन्य धर्म को मानने वाले अनुसूचित जाति के लोग एससी के संवैधानिक लाभ नहीं पा सकते। जनजाति सुरक्षा मंच चाहता है कि यही सिद्धांत अनुसूचित जनजातियों पर भी लागू किया जाए। इसके लिए संविधान की उस बुनियादी व्यवस्था को बदलना होगा, जिसमें अनुसूचित जनजाति की पहचान को किसी भी धर्म से नहीं जोड़ा गया है।

सम्मेलन के मंच पर बिरसा मुंडा की तस्वीर के साथ “भारत माता” की हिंदुत्ववादी छवि और पूर्व सांसद कार्तिक उरांव का चित्र भी लगाया गया था। कार्तिक उरांव ने कभी यह कहते हुए याचिका दायर की थी कि ईसाई उरांव आदिवासी अनुसूचित जनजाति सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते। लेकिन 1963 में पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि आदिवासी पहचान धर्म पर आधारित नहीं होती ; वह जातीय और सामुदायिक संबंधों पर आधारित होती है। अदालत ने साफ कहा था कि कोई उरांव हिंदू, ईसाई या बौद्ध होने पर भी उरांव ही रहता है। अदालत ने यह भी माना था कि धर्म परिवर्तन के बाद भी आदिवासी अपने सामुदायिक त्योहारों और सामाजिक जीवन में भाग लेते हैं।

आज जनजाति सुरक्षा मंच इसी संवैधानिक समझ को पलटना चाहता है। उसकी रणनीति बेहद खतरनाक है — पहले ईसाई आदिवासी परिवारों को सामाजिक रूप से अलग-थलग करो, उन्हें गांव के त्योहारों और ग्रामसभा से बाहर करो, फिर उसी बहिष्कार को यह साबित करने के लिए इस्तेमाल करो कि उन्होंने आदिवासी संस्कृति छोड़ दी है। यानी पहले बहिष्कार थोपो, फिर उसे प्रमाण बताओ।

दूसरी ओर, मंच यह प्रचार भी कर रहा है कि आदिवासी व्यापक “सनातन परिवार” का हिस्सा हैं। सम्मेलन में नेताओं ने कहा कि आदिवासी “राम की संतान” हैं और “सनातन के विशाल वृक्ष की छाया” में रहते हैं। तथाकथित “घर वापसी” कार्यक्रमों में आदिवासी प्रतीकों की जगह हिंदुत्व के प्रतीकों का इस्तेमाल होता है। गांवों में मंदिर बनाना, स्थानीय देवताओं को विष्णु, शिव या दुर्गा का रूप बताना, गांवों के प्रवेश द्वार पर हनुमान प्रतिमाएं स्थापित करना — यह सब आदिवासी आस्था के हिंदूकरण की सुनियोजित प्रक्रिया है।

संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म मानने और बदलने की स्वतंत्रता देता है। आदिवासी चाहे हिंदू हों, ईसाई हों या किसी अन्य धर्म को मानें, उनकी आदिवासी पहचान पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। यह बुनियादी संवैधानिक सिद्धांत है। यह कहना कि राम की पूजा आदिवासी संस्कृति है, लेकिन यीशु की पूजा उससे विचलन है, संविधान और इतिहास — दोनों के साथ छल है।

आदिवासी समाज लंबे समय से अपनी विशिष्ट धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान की मान्यता की मांग करता रहा है। झारखंड विधानसभा अलग जनगणना कॉलम की मांग का प्रस्ताव पारित कर चुकी है, ताकि आदिवासी अपने प्रकृति आधारित विश्वासों को दर्ज करा सकें। अनेक आदिवासी बुद्धिजीवियों और संगठनों ने भी यह मांग उठाई है, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे लगातार नजरअंदाज किया है।

गृह मंत्री अमित शाह ने इस पूरे अभियान को “नया उलगुलान” बताया। यह बिरसा मुंडा की विरासत का अपमान है। बिरसा का उलगुलान औपनिवेशिक शासन के खिलाफ विद्रोह था। उन्होंने मिशनरियों का विरोध इसलिए किया, क्योंकि वे उन्हें औपनिवेशिक सत्ता का हिस्सा मानते थे। आज उनकी विरासत का इस्तेमाल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है। शाह ने यह भी कहा कि सनातनी भी प्रकृति उपासक हैं और जल-जंगल-पहाड़ उनकी आस्था का केंद्र हैं।

जब दिल्ली में यह भाषण हो रहा था, उसी समय ओडिशा के रायगड़ा जिले के सिजिमाली में आदिवासी समुदाय अपनी पवित्र पहाड़ी को बॉक्साइट खनन से बचाने के लिए संघर्ष कर रहा था। छत्तीसगढ़ के हसदेव क्षेत्र में हजारों आदिवासी वर्षों से अपने जंगलों को निजी खनन कंपनियों के हवाले किए जाने का विरोध कर रहे हैं। लाखों पेड़ काटे जा चुके हैं, जिनमें साल और करम जैसे पवित्र वृक्ष भी शामिल हैं। जो लोग दिल्ली में प्रकृति पूजा की बात कर रहे हैं, वही जमीन पर प्रकृति विनाश के सबसे बड़े संरक्षक बने हुए हैं।

आज आदिवासियों के सामने असली सवाल वनाधिकार कानून को कमजोर किए जाने, ग्रामसभा की शक्तियों के क्षरण, पेसा कानून की अवहेलना, आरक्षित नौकरियों में भारी रिक्तियों, छात्रवृत्तियों के बकाये, छात्रावासों की बदहाली और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव का है। लेकिन जनजाति सुरक्षा मंच ने कभी इन सवालों पर आवाज नहीं उठाई। उसने जल-जंगल-जमीन पर कॉरपोरेट कब्जे के खिलाफ संघर्षरत आदिवासियों का साथ नहीं दिया। उलटे धार्मिक आधार पर समुदाय को बांटकर उसने उन्हीं ताकतों की मदद की है, जो आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर रही हैं।

दिल्ली का यह सम्मेलन और उसे मिला सरकारी समर्थन आने वाले समय की चुनौती का संकेत है। इसका जवाब आदिवासी समाज की एकता, लोकतांत्रिक शक्तियों के साझा संघर्ष और बिरसा मुंडा समेत महान आदिवासी नायकों की प्रतिरोध की परंपरा से ही दिया जा सकता हैl

(लेखिका माकपा और जनवादी महिला समिति की वरिष्ठ नेत्री और राज्यसभा की पूर्व-सदस्य हैं।)

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